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नगर पुलिस की मिलीभगत या कमजोरी? दबंगों के आगे घुटने टेकने को मजबूर पीड़ित परिवार

बस्ती में दबंगों का तांडव: अपनी ही जमीन पर निर्माण करने पर भूस्वामी पर जानलेवा हमला!

अजीत मिश्रा (खोजी)

दबंगों के आगे नतमस्तक पुलिस: अपनी ही जमीन पर निर्माण के लिए मोहताज भूस्वामी, खौफ के साये में परिवार

  • खाकी का इकबाल खत्म? अपनी ही जमीन के लिए दर-दर भटक रहा भूस्वामी, पुलिस ‘मूकदर्शक’
  • बक्सर गांव का ‘जंगलराज’: दबंगों ने तोड़ा मकान, थानेदार ने कहा- ‘यह मेरा मामला नहीं
  • क्या बस्ती में कानून का शासन खत्म हो गया है? दबंगों की धमकी से सहमा पूरा परिवार
  • पुलिस की बेरुखी से बढ़ा दबंगों का हौसला: निर्माण कार्य रोकने के लिए हुआ हमला

बस्ती: क्या खाकी का इकबाल खत्म हो गया है? क्या जिले में कानून का राज नहीं, बल्कि दबंगों का फरमान चलता है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि नगर थाना क्षेत्र के बक्सर गांव में एक परिवार अपनी ही पुश्तैनी जमीन पर निर्माण करने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। दबंगों की धमकियों से सहमा परिवार अब पुलिस अधीक्षक की चौखट पर न्याय की भीख मांग रहा है, लेकिन स्थानीय थाने की कार्यप्रणाली ने पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​थानेदार बने ‘अन्याय’ के मूकदर्शक

​बृजेश पाण्डेय नामक भूस्वामी का आरोप है कि 22 मई को दिन-दहाड़े गांव के ही घनश्याम पाण्डेय, प्रशांत पाण्डेय, अमित पाण्डेय और रमेश पाण्डेय ने अपने गुर्गों के साथ मिलकर उन पर और उनके पिता पर जानलेवा हमला कर दिया। लाठी-डंडों से लैस इन दबंगों ने न केवल मारपीट की, बल्कि निर्माण कार्य को ध्वस्त कर दिया। लेकिन जब पीड़ित न्याय की आस लेकर नगर थाने पहुंचा, तो वहां के थानाध्यक्ष ने जो रुख अपनाया, वह किसी भी जिम्मेदार अधिकारी के लिए शर्मनाक है।

​पीड़ित का आरोप है कि थानेदार ने ‘पल्ला झाड़ने’ की नीति अपनाते हुए मामले को सिरे से खारिज कर दिया और इसे एसडीएम का मामला बताकर पीड़ित को वहां से भगा दिया। सवाल यह है कि यदि किसी के घर पर हमला हो, जान से मारने की धमकी दी जाए और मारपीट हो, तो क्या वह थाना ‘मेरे अधिकार क्षेत्र’ का मामला नहीं है? क्या नगर पुलिस दबंगों की संरक्षक बनी हुई है?

​कागजों में मालिक, जमीन पर बेबस

​मामला गाटा संख्या 534 (रकबा 174 एअर) का है। अभिलेखों में जमीन बृजेश के बड़े पिता जनार्दन के नाम दर्ज है, यानी कानूनी रूप से जमीन पर इनका पूर्ण अधिकार है। 10 दिनों तक शांतिपूर्ण तरीके से निर्माण कार्य चला, लेकिन फिर दबंगों की कुदृष्टि इस पर पड़ गई। मजदूरों को डरा-धमकाकर भगाना और निर्माण को क्षतिग्रस्त करना सीधे तौर पर कानून व्यवस्था को चुनौती है।

​क्या किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है?

​बृजेश पाण्डेय का पूरा परिवार अब दहशत में जीने को मजबूर है। दबंगों की खुली धमकियों ने उन्हें घर से बाहर निकलने तक में असुरक्षित कर दिया है। पीड़ित ने पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाई है और अपनी जान-माल की सुरक्षा की मांग की है।

​अब देखना यह है कि क्या पुलिस अधीक्षक इस मामले में संज्ञान लेकर दबंगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हैं या फिर नगर पुलिस की तरह इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? अगर समय रहते इन दबंगों पर लगाम नहीं कसी गई, तो बक्सर गांव में किसी बड़ी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रश्न यह है कि क्या वर्दी का सम्मान दबंगों के दबाव में गिरवी रख दिया गया है?

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